
” डॉ. चंद्रकांत तिवारी ” हिमगिरि–हृदय पर हेमाभा, केदार–कांति कल्याणमयी,
शैल–शिखर पर शशि–शुभ्रा, ध्यान–दीप्ति हिमवर्णमयी।
अलकनंदा आलोक बहे, भागीरथी गाती गूढ़ गान,
निर्झर–निनादों में जागे, वेदों का निस्तब्ध विधान।
देवदार की दीर्घ भुजाएँ, नभ को करतीं मौन प्रणाम,
चीड़–चरण में पवन प्रार्थना, रचती वन–वीणा अभिराम।
हिम–धवल शिखरों पर ठहरी, स्वर्णिम प्रभा की मंद लहर,
ज्यों तपस्वी के शांत ललाट पर, चंद्रिका लिखे दिव्य स्वर।
मंदाकिनी की मृदु धारा, शिव–जटा से झरती ज्योति,
पाषाणों में प्राण जगाती, काल–कथा की अमर स्मृति।
कुहुक–कुहुक करती कंदराएँ, प्रतिध्वनि का गूढ़ विहान,
वन–उर में संचित प्रतीक्षा, बन जाती शाश्वत गान।
मेघ–मालिका गिरि–मस्तक पर, ओढ़े धूमिल ध्यान–वसन,
ज्यों योगी के अंतर–आँगन में, उठता हो ब्रह्म–स्पंदन।
भागीरथी के वेग–वक्ष में, जीवन–संघर्षों का सार,
अलकनंदा की कोमलता में, करुणा का नील विस्तार।
केदार–धाम की शिला–शिला में, युग–युग का तप जीवित है,
हिमालय की प्रत्येक श्वास में, शिव–तत्त्व अभी स्पंदित है।
पर्वत, पवन, पल्लव, निर्झर — सब साधक बन ध्यानमग्न,
देवभूमि के दिव्य दृश्यों में, आत्मा होती ब्रह्म–लग्न।
