विश्व हास्य दिवस पर विशेष रूप से एक व्यंग काव्य “नई-नई का ज़ुल्म”

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हे मेरे श्रोताओं, आज थोड़ा रहम भी करो,
हर बार ये “नई.. नई..” का ज़ुल्म कुछ कम करो,
कभी हमारे पुराने जज़्बात भी सुन लिया करो,
हम कवि को भी इंसान समझ लिया करो।

कवि बेचारा गहरी सोच में डूबा,
भावों का दरिया आधा-सा सूखा,
कल की बारिश भीगी है अब तक,
पर मंच तो माँग रहा सूखा सबक।

कभी प्रेम लिखो, तो कभी वीर बनो,
तो कभी देशप्रेम से बहता नीर बनो,
जैसे हर रस का ठेका कवि को मिला हो,
कवि का दिल ही “मेगा सेल” बना हो।

संवेदना अभी तो जन्म ले रही है,
अर्थ अभी भी भीतर सहमे हुए हैं,
पर श्रोता बोले—“जल्दी सुनाओ.. जल्दी सुनाओ!”,
“नया नहीं तो मंच छोड़ जाओ!”

कवि ने ठंडे दिमाग़ से कुछ सोचा,
इस जिद का सीधा उपाय ही खोजा,
पुरानी कविता को पहनाया नया लिबास,
बस नाम बदलकर कर दी कुछ ख़ास।

तालियाँ गूँजीं, वाह-वाह भी खूब हुई,
“कितनी ताज़ा!” “बहुत खूब..”—आवाज़ें भी ऊँची उठीं,
कवि ने मन ही मन ठहाका लगाया,
बासी माल भी कैसे बिकता—आज समझ आया!

तो फिर से कहती हूँ, हाथ जोड़—
थोड़ा समझो कवि दिल का भी जोड़,
हर बार “नई” का हक़ न माँगो,
कवि को भी थोड़ा जीने दो, यारो!

हे श्रोताओं, तो फिर से कहती हूँ
कवि दिल पर थोड़ा रहम भी करो,
हर बार ये “नई” का ज़ुल्म कुछ कम करो,
कभी हमारे पुराने जज़्बात भी सुन लिया करो,
हम कवि को भी इंसान समझ लिया करो।


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