
हिंदूकाल संवाददाता : कोलकाता / पश्चिम बंगाल: लोकतंत्र के महापर्व में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बीएलओ (BLO) और पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) के साथ अमानवीय व्यवहार की एक शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। चुनाव ड्यूटी में तैनात इन सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपना दर्द बयां किया है।
कुर्सी-मेज तक नसीब नहीं, दुकान की तरह सड़क पर बैठने को हुए मजबूर
दिन भर की ड्यूटी के बाद जब पत्रकारों ने इन कर्मचारियों से बात की, तो उनका गुस्सा और दर्द फूट पड़ा। उन्होंने बताया कि उन्हें काम करने के लिए न्यूनतम बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं दी गईं।
- बदहाली: कर्मचारियों को बैठने के लिए न तो टेबल दी गई और न ही बेंच।
- अव्यवस्था: एक साधारण दुकान की तरह उन्हें दो कुर्सियों और मामूली संसाधनों के भरोसे पूरे दिन खुले में बिठाया गया।
- अपमान: शिक्षकों ने कहा, “हम समाज के निर्माता हैं, सरकारी पदों पर कार्यरत हैं, लेकिन आज हमारे साथ जो व्यवहार हुआ, वह किसी अपमान से कम नहीं है।”
भूखे प्यासे रहकर किया कर्तव्य का पालन
सबसे दुखद पहलू यह रहा कि सुबह से शाम तक ड्यूटी करने वाले इन कर्मियों के लिए नाश्ते और दोपहर के भोजन (Lunch) तक की कोई व्यवस्था प्रशासन द्वारा नहीं की गई थी। अधिकारियों ने बताया कि वे पूरे दिन भूखे-प्यासे अपना काम करते रहे, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली।
“हमें सरकारी कर्मचारी होने के नाते काम करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिस तरह से हमें बाहर बिठाया गया और खाने-पीने तक की सुविधा नहीं दी गई, उससे हमारा स्वाभिमान आहत हुआ है।” —
एक पीड़ित शिक्षक
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल
पत्रकारों के सामने अपनी आपबीती सुनाते हुए इन कर्मचारियों के चेहरे पर डर और थकान साफ देखी जा सकती थी। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी कर्मचारियों से इस तरह का “बंधुआ मजदूरों” जैसा व्यवहार करना जायज है? क्या चुनाव जैसे महत्वपूर्ण कार्य को संपन्न कराने वालों के सम्मान की कोई कीमत नहीं है?
इस घटना के बाद से शिक्षकों और सरकारी कर्मियों के बीच भारी आक्रोश है। अब देखना यह है कि क्या उच्च अधिकारी इस घोर लापरवाही पर कोई संज्ञान लेते हैं या भविष्य में भी इन ‘लोकतंत्र के प्रहरियों’ को इसी तरह अपमानित होना पड़ेगा।
