
हिंदूकाल संवाददाता हाल ही में Narendra Modi द्वारा देशवासियों से की गई अपील ने राष्ट्रीय चर्चा को नया विषय दे दिया है। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से पेट्रोल-डीज़ल की खपत कम करने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, सोने की खरीद टालने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और संसाधनों का संयमित उपयोग करने का आग्रह किया है। यह अपील ऐसे समय आई है, जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल बाज़ार, विदेशी मुद्रा भंडार और महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है। �
Business Standard +1
प्रधानमंत्री का संदेश केवल आर्थिक बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की भावना को भी सामने लाता है। भारत जैसे विशाल आयात-निर्भर देश के लिए ईंधन की बचत सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा पर दबाव कम कर सकती है। यदि करोड़ों लोग थोड़ी-थोड़ी बचत करें, तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा हो सकता है। यही कारण है कि सरकार लोगों को “राष्ट्रहित में व्यक्तिगत अनुशासन” अपनाने की सलाह दे रही है। �
The Statesman +1
हालाँकि, विपक्ष ने इस अपील को सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की कमजोरी बताकर सवाल भी उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है, तो जनता से इस प्रकार के त्याग की अपेक्षा क्यों की जा रही है। लोकतंत्र में सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक संकटों का असर किसी भी देश से पूरी तरह अलग नहीं रखा जा सकता। �
Moneycontrol +1
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए। ऊर्जा संरक्षण, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और संसाधनों का संतुलित उपयोग केवल संकट के समय की मजबूरी नहीं, बल्कि भविष्य की स्थायी नीति भी होनी चाहिए। यदि नागरिक और सरकार दोनों समान जिम्मेदारी निभाएँ, तो भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी मजबूती से खड़ा रह सकता है।
